Friday, 18 August 2017

शारीरिक अस्वस्थता


Photo

लग्नेश (लग्न में स्थित राशी का स्वामी ग्रह) यदि षष्ठ, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हो तो जातक की "रोग प्रतिकारक क्षमता कमजोर होती हैं" और ऐसे जातक बार बार बीमारीयों के शिकार होते हैं एवं छोटी से छोटी बीमारी भी ठीक होने में लम्बा समय लेती हैं | यदि लग्नेश का सम्बन्ध शुभ ग्रहों से स्थापित हो रहा हो तो बुरे परिणामो में कमी आती हैं तथा शारीरिक अस्वस्थता से जातक जल्द ही उबरता हैं |

लग्नेश यदि पाप कर्तरी (लग्नेश की स्थिति से व्दितीय तथा द्वादश भाव में पाप ग्रह स्थित हो तो) में तो जातक शारीरिक रूप से दुर्बल होता हैं |

|| ॐ तत् सत् ||

Friday, 16 June 2017

कर्मफल का ज्योतिष सम्बन्ध




|| ॐ ||

पुर्वजन्मार्जितं कर्म, शुभं वा यदि वाशुभम |
तस्य पक्ति ग्रहा: सर्वे, सुचयन्तीह जन्मनि ||

जन्म तथा मरण रूपी भव बंधन में (अनेक जन्म में किये गए कर्म) जो किये हुए कर्म हैं, उन सबका शुभ (अच्छा) तथा अशुभ (बुरा) रूप में प्राप्त होने वाला परिणाम सूर्य आदि नव ग्रह द्वारा इस जन्म में मानव जीवन में सूचित किया जाता / मिलता हैं |

All the planets indicate clearly whether we are enjoying or suffering now as a result of our actions in our previous birth.

स्वकर्म भोक्तुं जायन्ते, प्रायेणैव हि जन्तवः |
क्षीणे कर्मणि चान्यत्र, पुनर्गच्छन्ति देहिनः ||

आत्मा खुद के कर्म भोग को पूरा करने के लिए बार बार इस पृथ्वी पर शरीर के माध्यम से जन्म लेती रहती हैं, यह सम्पूर्ण प्रक्रिया (जन्म मरण रूपी चक्र) कर्म भोग की समाप्ति (माेक्ष) तक इसी प्रकार शुरू रहते हैं |

Soul takes fresh births for reaping the fruits of privious lives. This Cycle of births goes on until the attainment of Moksha.

प्राग्जन्मार्जितपुण्याघ, प्राबल्योद्रेकहेतुतः |
प्रारब्धसंज्ञिमानुष्य, जातौजातकचिन्तनम् ||

पूर्व जन्म अनुसार अच्छे अथवा बुरे कर्मों के प्राप्त होने वाले परिणाम को " प्रारब्ध " ऐसा कहा जाता हैं और इस प्रारब्ध द्वारा इस जन्म मे प्राप्त होने वाले परिणामो कि व्याख्या करना इसे ज्योतिष में "जातक वर्णन" कहा जाता हैं |

The balance of good or bad Karma brought forward from previous birth is "Prarabdha Karma" and the reading of this "Karmas / Jatak Varnan" that goes under the name of Astrology.
|| ॐ तत् सत् ||

Saturday, 29 April 2017

शुभारम्भ मुहूर्त




किसी भी नये कार्य (नया कारखाना, नया दुकान, नया व्यापार ई.) का शुभारम्भ चर राशी / चर लग्न (मेष, कर्क, तुला, मकर) में ना करे, अन्यथा कार्य का शुभारम्भ होने के कुछ दिनों में ही नये काम से मन उब जाएगा और दूसरा कार्य शुरू करने का विचार बार बार मन में आएगा |

|| ॐ तत् सत ||

Wednesday, 26 April 2017

ग्रह अवस्था



ग्रह की दीप्त अवस्था :-


जन्म पत्रिका में यदि ग्रह खुद के उच्च क्षेत्र (उच्च राशी) में स्थित हो तो वह ग्रह "दीप्त अवस्था" में हैं ऐसा अर्थ होता हैं | दीप्त का अर्थ होता हैं सजग रहना, प्रकाशित रहना |


उदहारण :-
सूर्यदेव मेष राशी में उच्च के होते हैं, यदि यह अवस्था किसी जातक के पत्रिका में हो तो उस जातक के पत्रिका में सूर्य के दीप्त अवस्था के फल प्रभाव प्राप्त होंगे |


फल :-
यदि ग्रह दीप्त अवस्था में हैं तो खुद के दशाकाल में जातक को मान, सम्मान, ख्याति की प्राप्ति होती हैं, तथा जिस कार्य को करे उस कार्य में जातक की विजय होती हैं |


|| ॐ तत् सत ||

गज केसरी योग



गज केसरी योग :-


चन्द्र के केंद्र में गुरु का होना याने “गज-केसरी” योग कहलाता हैं |


संस्कृत में गज का अर्थ हैं “हाथी” और केसरी का अर्थ हैं “शेर” यदि हम केवल इन दो शब्दों के अर्थ को समझ ले, तो आसानी से इस योग के बारे में समझ जायेंगे, क्योंकि “एक जंगल के राजा हैं तो दुसरे सबसे विशालकाय प्राणी” |


जिस जातक की कुंडली में गज केसरी योग होता हो और यदि वो दूषित न हो (किसी पाप ग्रह से देखा न जाता हो तथा पाप कर्तरी में ना हो) तो ऐसे योग में जन्मे व्यक्ति प्रायः जीवन में सभी प्रकार के सुख प्राप्त करते हैं जैसे,


१. उत्तम कुल (सद आचरण युक्त माता पिता), श्रेष्ठ परिवार आदि प्रारंभिक जीवन की पृष्टभूमि |


२. ऐसे जातको में औरों के मुकाबले सिखने तथा समझने की शक्ति उत्तम होती हैं, यह लोग जल्द ही विषय की गंभीरता को भाप लेते हैं |


३. जीवन में इन्हें अपार सफलता मिलती हैं क्योंकि “खुद महेनत करने में पीछे नहीं हटते” |


४. ऐसे जातको की जान पहचान का दायरा काफी बड़ा होता हैं तथा जन समुदाय से जुड़ने में इन्हें रूचि होती हैं |


५. किसी भी विषय की गहनता को समझने की शक्ति के कारण, “भाषण आदि देने में तथा लोगों को खुद की बात समझाने में माहिर होते हैं” |

|| ॐ तत् सत ||

Monday, 24 April 2017

जन्मपत्रिका देखने की विधि



जन्मपत्रिका देखने / जांचने की विधि :-


जन्मपत्रिका में किसी भाव की जाँच करते समय न केवल राशी को महत्व देना चाहिए बल्कि नवांश और अन्य समुचित वर्गों पर भी विचार करना चाहिए.


किसी भाव का विश्लेषण करने में निम्नालिखित तथ्यों पर सावधानी पूर्वक विचार करना चाहिए -

१. प्रश्न सम्बंधित भाव अधिपति के बल, दृष्टी, युति और स्थिति |

२. प्रश्न सम्बंधित भाव का बल |

३. प्रश्न सम्बंधित भाव, भावाधिपति और उस भाव में स्थित ग्रहों या उस भाव पर दृष्टी डालने वाले ग्रहों के "प्राकृतिक गुण" |

४. क्या कीसी विशेष भाव में बनने वाले योग से प्रश्न सम्बंधित प्रभाव में कोई परिवर्तन हुआ है ? |

५. प्रश्न सम्बंधित भाव के स्वामी ग्रह की उच्च / नीच / सम स्थिति का भी प्रश्न के उत्तर पर सामान रूप से महत्त्व हैं |

६. प्रश्न सम्बंधित भाव के स्वामी या उस विशेष भाव का स्वामी जिस भाव में हैं उसके स्वामी की नवांश में अनुकूल / प्रतिकूल स्थिति |

किसी भी प्रश्न के उत्तर तथा निष्कर्ष पर पहुचने से पूर्व उपरोक्त तथ्यों पर समुचित रूप से विचार कर लेना आवश्यक हैं |

|| ॐ तत् सत ||

व्यय भाव



जन्मपत्रिका के द्वादश भाव से "खर्च" का अनुमान लगाया जाता है |


घाटा, व्यय, दंड, कारावास, अस्पताल में भर्ती होना, बुरी आदतें, ध्यान, गुप्त शत्रु, जन्म स्थान से दूर निवास आदि का ज्ञान द्वादश भाव से प्राप्त होता है |


व्यक्ति की सोच से ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है, इस व्यक्तित्व विकास में बाधक होती है हमारी (अच्छी / बुरी) आदते | यदि हम एक लाख रुपये कमाए पर हमें जुआ, शराब जैसी बुरी आदते हो तो वह पैसा हमारी बर्बादी का कारण बनता है |



जेल (कारावास) जाना, अस्पताल में भर्ती होना बड़ी बीमारी होना आदि बाते भी हमें द्वादश स्थान के द्वारा ज्ञात होती है |


गुप्त शत्रु तथा चुगलखोरी भी इसी स्थान से जानी जा सकती है |


द्वादश स्थान से दो मुख्य बाते जानी जाती है, विदेश गमन तथा ध्यान (योग मार्ग की उच्चतम अवस्था) |



|| ॐ तत् सत ||