Monday, 24 April 2017

रोग भाव



जन्मपत्रिका का षष्ठ भाव जो "शारीरिक रोग" के सम्बन्ध में देखा जाता है |


षष्ठ भाव से विचारणीय विषय कर्जा, रोग, शत्रु, भय, अपमान इस प्रकार है, जो एक बार पढने पर ऐसा लगता है जैसे पूरी पत्रिका की सारी गलत बाते जो हमारे जीवन में घटित होने वाली है, उसका कारण षष्ठ स्थान है, परन्तु ऐसा नहीं है आइये इसे जरा विस्तार से समझते है |


षष्ठ स्थान से रोग, भय, शत्रु आदि देखने में आते है जो की उसकी विशेषता देखने के बाद सत्य प्रतीत होती है, आज के समय में हमारा शरीर यदि स्वस्थ है तो हम हर जगह मांग (demand) में है लेकिन यदि हमारा शारीर हमारा साथ ना दे रहा हो तो हम किसी कर्म के लिए उपयोगी नहीं, शत्रु के बारे में यदि हम जान जाये तो हमारा अहित नहीं किया जा सकता |


एक और महत्वपूर्ण विषय षष्ठ स्थान से देखा जाता है जिसे "कर्ज" कहते है आज के समय में खुद के जीवन स्तर (Life Style) को व्यवस्थित रखने के लिए हर कोई दौड़ रहा है, जीस के लिए हमें कर्ज की भी आवश्यकता होती है, कर्ज आसानी से प्राप्त होना साथ ही नियत समय पर चूका पाना यह भी षष्ठ स्थान से सम्बंधित विषय है |


इसे ध्यान से पढने पर षष्ठ स्थान किस प्रकार उत्तम है यह आसानी से समझा जा सकेगा |

|| ॐ तत् सत ||

पंचम भाव


जन्मपत्रिका के पंचम भाव से "विस्तार" देखा जाता है |


विस्तार से सम्बन्ध है हमारी बुद्धि का जिसका विस्तार ज्ञान के रूप में होता है इसी कारण से पंचम भाव हमारे ज्ञान को तथा हमारी बुद्धि की विशेषताओ को दर्शाता है जैसे की हमारी शिक्षा (Study) |


विस्तार का और एक सम्बन्ध है जो पंचम स्थान से देखा जाता है जिसकी समस्त जगत को जरुरत है वो है "संतान" एवं संतान तथा कुटुंब वृद्धि संसार की जरुरत भी, कुटुंब स्थान अर्थात द्वितीय स्थान से चतुर्थ होने के कारण यह कुटुंब का सुख है इसीलिए कुल का विस्तार भी इसी स्थान से देखने में आता है इसी कारण से संतान का विचार भी पंचम भाव से किया जाता है |


हमारा इस जगत में आना यह एक कारण है जो हमें पंचम भाव से ज्ञात होता है | चतुर्थ सुख का कारण है तो पंचम उसका धन अर्थात सुख में विस्तार कैसे हो यह भी पंचम भाव से जाना जाता है |


पंचम भाव से "भक्ति" भी ज्ञात होती हैं, यदि हमारे मन में भक्ति है, स्थिरता है, श्रद्धा हैं, लगन हैं तो हम सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं
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|| ॐ तत् सत ||

Thursday, 9 February 2017

चतुर्थ भाव



जन्मपत्रिका में चतुर्थ भाव से सुख का विचार किया जता है, जो की उसकी विशेषताओ को देख कर सत्य प्रतीत होता है आइये जाने इसे,

सब से पहली बात चतुर्थ भाव से देखने में आती है जो है "माँ", माता का सुख जीवन में सभी सुखो की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योकि जब हम इस धरती पर जन्म लेते है तब एकमात्र माँ ही हमारे साथ होती है हर पल में, हर क्षण में, जब हम किसी भी परिस्थिति में डगमगाते है सर्व प्रथम माँ का ही नाम याद करते है इसी कारण चतुर्थ को सुख स्थान से संबोधित किया जाता है |

चतुर्थ स्थान में और भी कुछ सुख शांति की वस्तुए अवलोकित की जाती है जैसे घर, वाहन, वस्त्र, अलंकार आदि यह सब हमें भौतिक सुख प्रदान करते है |

चतुर्थ स्थान जन्मपत्रिका में तृतीय (पराक्रम स्थान) का धन स्थान है अर्थ यह है की हमारे पराक्रम का लक्ष्य हमें (मूल्य / सुख / शांति के रूप में) प्राप्त होगा या नहीं यह भी चतुर्थ स्थान से जाना जा सकता है |

|| ॐ तत् सत ||

Tuesday, 7 February 2017

पराक्रम भाव





जन्मपत्रिका में तृतीय स्थान अपने आप मे "एक कर्ता" की भूमिका निभाता है, तृतीय स्थान से व्यक्ति के पराक्रम एवं कर्म करने की क्षमता "कर्म के प्रति जागरुकता तथा कर्म कौशल का पराक्रम" ये बाते ज्ञात होती है |


हमारे शरीर का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग जो हमरी भुजाये (हाथ) है उनका विचार इस स्थान से कीया जाता है |

तृतीय स्थान से जहा हम कर्म कुशलता के विषय में जान सकते है उसी प्रकार यदि कर्म करने में या पराक्रम करने में कोई अपयश आ रहा हो तो उसके बारे में भी जाना जा सकता है |

केवल शारीरक पराक्रम ही नहीं वरन भौतिक पराक्रम के बारे में जानने के लिए भी तृतीय स्थान का विशेष महत्व है |

कर्म में आने वाली अकारण समस्या अथवा कर्म पूरा होते होते रुक जाना यह सब हमारे पराक्रम पर ही तो निर्भर करता है |

हमने किसी कार्य के लिए यदि अपना पराक्रम १००% नहीं दिया है तो हम कितने भी बुद्धिशाली हो नुकसान हमारा ही होता है, क्योकि बुद्धि के साथ कर्म का भी तो जोड़ लगता है |

जन्मपत्रिका का तृतीय स्थान हमारे पराक्रम तथा कार्य में हो रही असफलताओ को दर्शाता है |


|| ॐ तत् सत ||

Wednesday, 25 January 2017

वाणि / धन भाव





जन्मकुंडली में द्वितीय भाव एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है क्योकि कलियुग में इस स्थान की बलवत्ता के बिना किसी भी कर्म को पूर्ण करना असंभव है |

द्वितीय भाव से "धन, अन्न, कुटुंब, वाणी (बोलने की कुशलता)" आदि का विचार किया जाता है |

आज के युग में हमारे पास कितना भी ज्ञान हो पर यदि उस ज्ञान का उपदेश देने की कला न हो अथवा धन का अभाव हो तो हमारे ज्ञान का कोई उपयोग नहीं हो सकता, इसी कारण से जन्मकुंडली का द्वितीय भाव एक विशेष स्थान है जिसकी मदत से आर्थिक स्थिति का विवरण जाना जाता है |

परन्तु द्वितीय स्थान एक मारक स्थान भी है क्योकि "जहा हमारी वाणी लोगो को हमसे जोडती है - उसी वाणी का दुरूपयोग हमारे पतन का कारण भी बन सकता है " जैसे शिशुपाल (महाभारत के पात्र) का अंत उनकी वाणी का दुरुपयोग करने के कारण हुआ |

|| ॐ तत् सत ||

Tuesday, 3 January 2017

लग्न स्थान




जन्म समय में आकाश पटल पर पूर्व क्षितिज में उदित होने वाली राशि को (जन्म कुंडली) में लग्न स्थान, प्रथम भाव, देह, तनु आदि नामों से संबोधित किया जाता हैं | 

प्रथम स्थान में उदित राशि के अनुसार जातक का शरीर सौष्ठव (शारीरिक रचना), मानसिक विचार प्रणाली, रूप (सुन्दरता), गुण एवं वर्तमान में जातक को किन परिस्थितियों का सामना करना पड सकता है उस पर विचार किया जाता है |

जन्मकुंडली में किसी भी प्रश्न पर विचार करने से पूर्व जातक की स्वविचारधारा क्या है ? इस बात का ज्ञान प्रथम स्थान से होता / किया जाता है |

जिस प्रकार किसी भी पेशंट का इलाज करने से पूर्व उसकी मुख्य बीमारी को जानना जरुरी है, ठीक उसी प्रकार ज्योतिष में यदि प्रथम भाव का विश्लेषण सही तरह से किया जाये तो जातक को भलीभांति समझा जा सकता है तथा उसके मुख्य प्रश्न का विश्लेषण कर उत्तम निष्कर्ष प्रदान किया जा सकता है |


|| ॐ तत् सत ||

Wednesday, 30 November 2016

ग्रह तथा शारीरिक बीमारियां




-: ग्रहों का शारीरिक बीमारियों से सम्बन्ध :-

"सूर्य" कमजोर हो तो जातक की जठराग्नि मंद होती है | 

भूख कम लगना अथवा भोजन किया हुआ अन्न पचने में परेशानी यह रोग 'सूर्य' ग्रह के कारण होते है |


"चन्द्र" बलहीन हो तो जातक मानसिक रोग से ग्रसित होता है |
भूल जाना, स्मरण शक्ति कम होना अथवा विस्मरण होना यह रोग 'चन्द्र' ग्रह के कारण होते है |


"मंगल" बलहीन हो तो जातक रक्त विकारो के रोग से ग्रसित होता है | 
रक्त की अशुद्धि अथवा रक्त की कमी आदी रोग 'मंगल' ग्रह के कारण होते है |


"बुध" बलहीन हो तो जातक त्वचा रोग से ग्रसित होता है | 
त्वचा पर दाग होना अथवा त्वचा में खुजली आदी रोग 'बुध' ग्रह के कारण होते है |


"गुरु" बलहीन हो तो जातक की ज्ञानशक्ति में कमी होती है | 
विषय का अधुरा ज्ञान, एकाग्रता की कमी, विद्याप्राप्ती में मन ना लगना, विचारो की अस्थिरता आदी 'गुरु' ग्रह के कारण होते है |


"शुक्र" बलहीन हो तो जातक कांतिहीन होता है | 
चेहरा निस्तेज होना 'शुक्र' ग्रह के कारण होते है |


"शनि" बलहीन हो तो शरीर में स्नायु विकार की संभावना अधिक होती है | 
जोड़ो का दर्द होना (joints pain), रीढ़ की हड्डी में दर्द होना 'शनि' ग्रह के कारण होते है |



|| ॐ तत् सत् ||